Thursday, 20 July 2017

एक कहानी

कुछ लोग
जो मेरे दिल को अच्छे लगते थे
उम्रों के रेले में आए
और जा भी चुके
कुछ धंदों में मसरूफ़ हुए
कुछ चूहा-दौड़ में जीते गए
कुछ हार गए
कुछ क़त्ल हुए
कुछ बढ़ती भीड़ में
अपने-आप से दूर हुए
कुछ टूट गए कुछ डूब गए
मुझ पर ये ख़ौफ़ अब छाया है
मैं किस से मिलने जाऊँगा
मैं किस को पास बुलाऊँगा
आँधी है, गर्म हवा है, आग बरसती है
कुछ देर हुई
इक सूरत, शबनम सी सूरत
इस तपती राह से गुज़री थी
दो बच्चे पेड़ के पत्तों में छुप कर बैठे थे
हँसते शोर मचाते थे
इक दोस्त पुराना
बरसों बाद मिला मुझ को
उस जलते दिन की
सुब्ह कुछ ऐसी रौशन थी
जब बाद-ए-सबा वारफ़्ता-रौ
ख़ुशबुओं, नग़्मों, नन्ही-मुन्नी बातों का
अंदाज़ लिए आँगन में चली
मैं ज़िंदा हूँ
ये सोच के ख़ुश हो जाता हूँ
वो थोड़ी देर तो मेरे पास से गुज़री थी
वो मेरे दिल में उतरी थी
इस बे-महरम से मौसम में
शायद वो कल भी आएगी
शायद वो कल भी मेरी राह से गुज़रेगी

Saturday, 8 July 2017

कागज़ की कश्ती


वो अक्सर मुझे खुदसे दूर रहने की हिदायत देती है, कहती है कि हम दोनों का कोई मेल नहीं है।

"मैं तेज़ बारिश हूँ और तुम कागज़, पास आओगे तो गल जाओगे।" वो मुझसे कहती है।

"कोई कागज़ का मामूली टुकड़ा नहीं, कागज़ की कश्ती हूँ मैं, तुम्हारे बिना मेरा कोई अस्तित्व है क्या? माना गलना ही है मुकद्दर मेरा, पर गलने से पहले कुछ देर साथ तो चल ही सकते हैं ना। अगर कागज़ की कश्ती बारिशों में गलने के डर से कभी पानी में ना उतरती तो उसके होने का कोई मतलब नहीं रहता, वो भी बाकि कागज़ों की तरह किसी रद्दी के ढेर में दफ़्न हो जाती या फिर अंत में किसी कूड़ेदान की भेंट चढ़ जाती। अब तुम ही बताओ, सालों किसी रद्दी के ढेर में सड़ते रहना अच्छा है या कुछ पल के लिए बारिश के पानी में उतरकर अपना सफ़र पूरा करना और मंज़िल आने पर शान से गलना। और गलने के बाद उसी पानी में समा जाना?
मैं रद्दी बनकर अपना जीवन नहीं काटना चाहता, तुम मुझे शान से गलने का मौका दोगी ना?" मैं उससे पूछता हूँ।

इतना सुनने के बाद मुझे उसकी आँखों का तूफ़ान शांत होता दिखता है। वो तेज़ बारिश है, इस तथ्य को मैं नकार नहीं सकता, पर आज उसकी आँखों में मुझे एक ठहराव नज़र आ रहा है। एक मद्धम ठहराव जो झील सा स्थिर नहीं है पर अब उनमें आँधी-तूफानों का वेग भी नहीं है। ठीक वैसा ही मद्धम बहाव है जैसा बारिशों के वक़्त होता है, पानी का वो मद्धम बहाव जिसमें अक्सर कागज़ की कश्तियाँ तैरती हैं।

Friday, 16 June 2017

जुस्तुजू


जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने

Saturday, 10 June 2017

कुछ ऐसा हो जैसे

कोई फ़रियाद तेरेदिल में दबी हो जैसे
तू ने आँखों से कोई बात कही हो जैसे
जागते जागते इक उम्र कटी हो जैसे
जान बाक़ी है मगर साँस रुकी हो जैसे
हर मुलाक़ात पे महसूस यही होता है
मुझ से कुछ तेरी नज़र पूछ रही हो जैसे
राह चलते हुए अक्सर ये गुमाँ होता है
वो नज़र छुप के मुझे देख रही हो जैसे
एक लम्हे में सिमट आया है सदियों का सफ़र
ज़िंदगी तेज़ बहुत तेज़ चली हो जैसे
इस तरह पहरों तुझे सोचता रहता हूँ मैं
मेरी हर साँस तेरे नाम लिखी हो जैसे

Wednesday, 7 June 2017

तेरा हाथ, हाथ में हो अगर

तेरा हाथ, हाथ में हो अगर,
तो सफर ही असले हयात है.

मेरे हर कदम पे है मंज़िलें,
तेरा प्यार ग़र मरे साथ है.

मेरी बात का मेरी हमनफ़स,
तू जवाब दे कि ना दे मुझे,

तेरी एक चुप में जो है छुपी,
वो हज़ार बातों कि बात है.

मेरी ज़िंदगी का हर एक पल,
तेरे हुस्न से है जुड़ा हुआ.

तेरे होंठ थिरके तो सुबहें है,
तेरी ज़ुल्फ बिखरें तो रात है.

तेरा हाथ, हाथ में हो अगर,
तो सफर ही असले हयात है.

Tuesday, 6 June 2017

तुम और सिर्फ तुम



तुम्हें तो आज़ादी पसंद थी, फिर क्यों कैद हो मेरी कहानियों में, किस्सों में, यादों में, बातों में?

याद है मुझे जब तुम अपने लम्बी, घनी ज़ुल्फ़ों  को खुला छोड़ दिया करती थीं तो अक्सर मैं पुछा करता था कि इन्हें बाँध कर क्यूँ नहीं रखती हो। खुली जुल्फ़ हवा के झोंके की वजह से कहीं उलझ ना जाए। तो तुम कहती, "मुझे बँधना पसंद नहीं।" मैं तो उड़ना चाहती हूँ, इन खुले आसमानों में एक आज़ाद पंछी की तरह। गिरना चाहती हूँ उन बूंदों की तरह जिसका इंतजार रहता है हर एक प्यार करने वाले को। खोना चाहती हूँ कहीं दूर पहाड़ों में जहाँ से कोई ढूँढ ना पाये। डूबना चाहती हूँ खुद में और खुद को जानना चाहती हूँ। खुद से एक सवाल करना चाहती हूँ कि कौन है ये शख्स जो इतने सवाल करता है।"

फिर मैं कहता, "सवाल करना तो मेरा काम है, तुम्हारा नहीं।"

और फिर हम दोनों एक साथ हँस पड़ते।

अलग थीं तुम इस दुनिया से, काफी अलग। तुम्हारी बातें भी तुम्हारी तरह थीं, ख़ुशनुमा और जिन्दादिल!

जब तुम हँसती थीं तो मानो हर तरफ ख़ुशी की लहर दौड़ जाती थी।

तुम एक शांत झील सी थीं, मैं हिचकोले मारता कोई दरिया।

तुम मिश्री सी मीठी थीं, मैं मिर्च सा तीखा।

तुम आसमान थीं तो मैं ज़मीन।

लेकिन एक चीज़ थी जो हमें आपस में जोड़े हुए थी और वो था प्यार का बंधन। इक ऐसा अटूट बंधन जिसकी डोर ऊपरवाले के हाथों में थी।

लेकिन तुम्हें तो बँधना पसन्द नहीं था।

फिर ये प्यार कैसे? ये बंधन कैसा?

तुम कहाँ इस प्यार-व्यार को मानती थीं?

तुम कहती- "ये साथ है कुछ पलों का, जब तक अच्छा लगे तब तक का।" जीवन ठहराव का नाम थोड़े ना है, ये तो गतिशील है, निरन्तर चलने वाले समय की तरह।

काश! समय को हम रोक सकते। उन पलों को फिर से जी सकते। मुठ्ठियों में कैद कर सकते। काश!

और एक दिन बिना बताये तुम चली गयी। कहाँ? ये किसी को पता नहीं।

तुमने वही किया जो तुम करना चाहती थी बिना एक पल भी सोचे कि तुम्हारे बिना मेरा क्या होगा।

खैर तुम हमेशा से मनमौजी थीं। किसी की भी एक नहीं सुनती थीं । तुम खुद में ही सम्पूर्ण थीं और मैं तुम में।

तुम तो चली गयीं और मैं वहीं रह गया। तुम तब भी आजाद थी और अब भी। मैं तब भी तुम्हारे साथ था और अब भी। बस फर्क इतना है कि पहले तुम पास थी अब तुम्हारी यादें पास हैं।

मुस्कुराता कम हूँ अब, थोड़ा गंभीर हो गया हूँ। पहले से ज़्यादा समझदार हो गया हूँ।

तुम्हें अपनी कहानियों में बसा रखा है, जब भी अकेला होता हूँ तुम्हें याद कर लेता हूँ।

लोग कहते हैं कि अब तो भूल जाओ उसे और किसी का साथ अपना लो, कबतक यूँ अकेले रहोगे?

इस पर मैं मुस्कुरा देता हूँ।

उन्हें कौन समझाए कि मैं अकेला नहीं हूँ और ना ही तुम मुझसे दूर।

हम तो हमेशा साथ थे- पहले हाथों में हाथ था, और अब किताबों में बात।

A lost hope

Fountains of lament burst through my desires for you.. Stood like the height of a pillar that you were, I could see your moving eyes ...