Saturday, 10 February 2018

कई बार

कई बार देखी हैं सिंदूरी शामें
उफ़क़ते परे जगमगाती हुई
कई बार खामोशियों में सुना है
गुजरती हैं, मुझको बुलाती हुई
जहां पे मिले वो, जहां जा रहा हूं
मैं लाने वही आसमां जा रहा हूं
किसी आसमां पे तो साहिल मिलेगा
बहुत बार सोचा, ये सिन्दूरी रोगन
जहां पे खड़ा हूं, वहीं पे बिछा दूं
ये सूरज के ज़र्रे ज़मीं पे मिले तो
एक और आसमां मैं, ज़मीं पे बिछा दूं
जहां पे मिले वो, जहां जा रहा हूं
मैं लाने वही आसमां जा रहा हूं
किसी आसमां पे तो साहिल मिलेगा
मैं लाने वही आसमां जा रहा हूं
किसी आसमां पे तो साहिल मिलेगा
मैं लाने वही आसमां जा रहा हूं
जहां पे जमीं आसमां छू रही है
वहीं जा रहा हुं, वहां जा रहा हूं
किसी आसमां पे तो साहिल मिलेगा

हनीमून

कल तुझे सैर करवाएंगे समन्दर से लगी गोल सड़क की
रात को हार सा लगता है समन्दर के गले में !

घोड़ा गाडी पे बहुत दूर तलक सैर करेंगे 
धोडों की टापों से लगता है कि कुछ देर के राजा है हम !

गेटवे ऑफ इंडिया पे देखेंगे हम ताज महल होटल 
जोड़े आते हैं विलायत से हनीमून मनाने ,
तो ठहरते हैं यही पर !

आज की रात तो फुटपाथ पे ईंट रख कर ,
गर्म कर लेते हैं बिरयानी जो ईरानी के होटल से मिली है 
और इस रात मना लेंगे "हनीमून" यहीं जीने के नीचे !

याद किया है तुम्हे

आदतन तुमने कर दिए
आदतन हमने ऐतबार
किया
तेरी राहों में बारहा रुक कर
हमने अपना ही इंतज़ार किया

अब ना माँगेगे ज़िंदगी या रब
ये गुनाह हमने एक बार किया

खर्ची

जिंदगी की भागम भाग और रोजी रोटी की चिंता में न जाने कितने पल यूँ ही बीत जाते हैं ...अपनों का साथ जब कम मिल पाता है तो दिल में उदासी का आलम छा जाता है ..और तब याद आ जाता है वह गाना दिल ढूढता है फ़िर वही फुर्सत के रात दिन बैठे रहें तस्वुर -ऐ -जानां किए हुए ...पर कहाँ मिल पाते हैं वह फुर्सत के पल ..


मुझे खर्ची में पूरा एक दिन हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है ,झपट लेता है ,अंटी से


कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने कि आहट भी नही होती
खरे दिल को भी मैं खोटा समझ कर भूल जाता हूँ !

गिरेबां से पकड़ कर माँगने वाले भी मिलते हैं !
तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है ,
तुझे किश्तें चुकानी है -"

जबरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है ये कह कर
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिए रख ले
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं ,
जब होगा हिसाब होगा

बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं अपने लिए रख लूँ
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है !

Friday, 9 February 2018

जिस्म की हर बात है आवारगी ये मत कहो

जिस्म की हर बात है आवारगी ये मत कहो
हम भी कर सकते हैं ऐसी शायरी ये मत कहो
उस नज़र की उस बदन की गुनगुनाहट तो सुनो
एक सी होती है हर इक रागनी ये मत कहो
हम से दीवानों के बिन दुनिया सँवरती किस तरह
अक़्ल के आगे है क्या दीवानगी ये मत कहो
कट सकी हैं आज तक सोने की ज़ंजीरें कहाँ
हम भी अब आज़ाद हैं यारो अभी ये मत कहो
पाँव इतने तेज़ हैं उठते नज़र आते नहीं
आज थक कर रह गया है आदमी ये मत कहो
जितने वादे कल थे उतने आज भी मौजूद हैं
उन के वादों में हुई है कुछ कमी ये मत कहो
दिल में अपने दर्द की छिटकी हुई है चाँदनी
हर तरफ़ फैली हुई है तीरगी ये मत कहो

Wednesday, 7 February 2018

मौसम का झोंका था



किसी मौसम का झोंका था..

जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है

गए सावन में ये दीवारें यूँ सिली नहीं थी

न जाने इस दफा क्यूँ इनमे सीलन आ गयी है ,

दरारे पड़ गयी हैं

और सीलन इस तरह बहती है जैसे खुश्क रुखसारों पे गीले आंसू चलते हैं


ये बारिश गुनगुनाती थी इसी छत की मुंडेरों पर

ये घर की खिडकियों के कांच पर ऊँगली से लिख जाती थी संदेसे...

बिलखती रहती है बैठी हुई अब बंद रोशनदानो के पीछे


दुपहरें ऐसी लगती हैं बिना मुहरों के खाली खाने रखे हैं

न कोई खेलने वाला है बाज़ी और न कोई चाल चलता है


ना दिन होता है अब न रात होती है

सभी कुछ रुक गया है

वो क्या मौसम का झोंका था जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है

Sunday, 4 February 2018

चाय

सुनो!
दुनिया चाहे तुम्हें कितना भी
भला-बुरा कहती हो,
लेकिन तुम मेरे लिए बेहद ख़ास हो।

मैं हर सुबह उठते ही तुम्हें याद करता हूँ,
तुम्हारे बिना न ऑफ़िस जाता हूँ,
ना कोई काम करता हूँ।
और फिर शाम को घर में कदम रखते ही,
मैं तुम्हें फिर से अपने पास देखना चाहता हूँ।

सच बताऊँ तो,
तुम मेरी ज़रूरत हो।
जैसे रोज़ कैंटीन का खाना देख
याद आती हैं माँ,
जैसे रोज़ ऑफ़िस का काम देख
याद आते हैं पापा।

सुनो चाय!
तुम्हारे साँवलेपन पर फ़िदा हूँ मैं,
तुम्हारे मीठेपन की ज़रूरत है मुझे।
तुम्हारा, मेरे पास होना ही अपनेपन का एहसास
दिलाता है।
यक़ीन मानो, तुम सबसे अलग हो,
और मैं तुम्हारा तलबगार हूँ।

A lost hope

Fountains of lament burst through my desires for you.. Stood like the height of a pillar that you were, I could see your moving eyes ...